आज सुबह अलार्म 7 बजे बजा, पर उठ ही नहीं पाई।
रात के 2 बजे तक फोन में वही गेम खेलती रही, आँख कब लगी पता नहीं चला। सुबह जब आँख खुली तो सैर का समय निकल चुका था।
पिछले कुछ दिन से सोचा था आज से इंटरव्यू तैयारी वाली किताब के कुछ पन्ने पढ़ूंगी। वो भी नहीं हुआ।
घुटने में हल्की अकड़न अब भी रहती है, आज तो चलना ही नहीं हुआ तो वो बात अलग है।
डॉक्टर ने BP का जो हिसाब समझाया था, वो कागज अभी मेज पर पड़ा है। रोज सोचती हूं कल से ठीक शुरू करूंगी, पर रात का फोन फिर रोक लेता है।
आज बस यही मन में अटका रहा कि कितना वक्त ऐसे ही निकल जाता है।
