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मन का समय ›आँसुओं की कहानियाँ

दुकान, ब्रेड और हिसाब साथ उलझे

पिछली बार जो ब्रेड का टाइमर भूल जाने वाली बात यहाँ लिखी थी, उसके बाद से मोबाइल में टाइमर के साथ अलग से अलार्म भी लगाना शुरू कर दिया। लगा था अब वैसा 2 बारा नहीं होगा। टाइमर तो अब सच में याद रहने लगा है, पर असल मुश्किल किसी और जगह से निकल आई, वो भी कुछ दिनों में ही पता चल गया।

दुकान सुबह 8 बजे खोलती हूं, उससे पहले घर में आटा गूंधना भी शुरू कर चुकी हूं, 2 दिन पहले जो ऊँचे स्टूल पर बैठकर किया था वही अब रोज़ का हिस्सा बन गया है। फिर शाम को दुकान बंद करने के बाद रात में हिसाब की कॉपी खोलकर बैठती हूं। तीन काम अब एक साथ चल रहे हैं –
– सुबह ब्रेड गूंधना और पकाना
– दिन भर गल्ले पर बैठना
– रात को हिसाब की कॉपी भरना

अकेले ये तीनों निभाना अब भारी लगने लगा है। हिसाब की कॉपी में जो तरीका मिला था वो आज़माकर 2 बारा लिखना शुरू किया, सोचा था शायद इस बार महीने का टोटल ठीक से मिल जाएगा। कल रात 12 बजे तक बैठी रही, हर दिन का खर्चा अलग कर के लिखा, फिर भी बीच के 5 दिन का हिसाब कहीं अटका हुआ है, समझ नहीं आ रहा उन दिनों का पैसा किस मद में गया। शायद दुकान की छोटी-छोटी उधारी वहीं कहीं भूल गई, अब वापस याद करना मुश्किल लग रहा है।

लैपटॉप की ऊँचाई वाला वीडियो भी देखा था, मेज़ के नीचे दो पुरानी किताबें रखकर ऊँचाई बढ़ाई, गर्दन को थोड़ी राहत मिली, ये सच है। पर पीठ अब भी वैसी ही भारी रहती है, रात को उठने में वही पुरानी तकलीफ। डॉक्टर ने कहा था कि अभी स्थिति स्थिर है, आगे बिगड़ने का डर नहीं, पर रोज़ का यह भारीपन कहीं जाता नहीं, सिर्फ साथ चलता रहता है।

उस दिन एक ग्राहक ने देखकर कहा था, “इतनी देर तक झुककर बैठती हो, थक नहीं जाती” मैं हँस कर बात टाल गई थी, पर घर आकर सोचा तो लगा वो ठीक ही कह रही थी। टाइमर भूलने वाला किस्सा लिखा तो किसी ने लिखा था राहत की बात है कि अंदर से ठीक निकल आई, सच में तब राहत हुई थी, पर उस राहत के बाद भी थकान वहीं की वहीं रह गई, सिर्फ जगह बदल गई।

दुकान, ब्रेड, हिसाब तीनों अलग-अलग दिन शुरू किए थे, हर बार सोचा था एक-एक करके ठीक हो जाएगा। अभी लग रहा है तीनों एक साथ गले तक आ गए हैं।

कमेंट 1

  • मुस्कान11.02 22:01

    रोटी और हिसाब साथ… मुझसे भी 2 काम साथ नहीं होते

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