आज रात नौ बजे के बाद घर पहुंची। बच्चों का होमवर्क, डिनर, फिर कल की प्रेजेंटेशन की तैयारी… बैठने की भी फुर्सत नहीं मिली।
अगले तीन हफ्तों में तीन शादियां हैं, एक तो इसी शनिवार को। कपड़े अभी तक नहीं देखे, पार्लर की बुकिंग भी बाकी है।
सच कहूं तो [क्या पहनूं] से ज़्यादा टेंशन इस बात की है कि इतने सारे रिश्तेदार एक साथ मिलेंगे… गर्दन और हाथों के दाग अभी भी साफ दिखते हैं। मेकअप से कितना छुपेगा, पता नहीं।
पिछले हफ्ते सास ने पूछा भी था, “ये अभी तक ठीक क्यों नहीं हुआ?” मैं कुछ जवाब नहीं दे पाई, बस हंस दी।
तीन हफ्ते पहले ही ठीक से केयर शुरू की है, जल्दी कुछ बदलेगा भी नहीं। ये सब पता है… फिर भी मन थोड़ा भारी हो जाता है।
सुबह पांच बजे उठकर टिफिन बनाया, दिनभर ऑफिस, शाम को बेटे की स्कूल मीटिंग भी थी। रविवार को दोस्तों के साथ ट्रेकिंग जाना था, वो प्लान भी शायद कैंसल करना पड़े।
कभी-कभी सोचती हूं आखिर एक साथ इतना सब कैसे मैनेज होगा… खुद के लिए तो समय ही नहीं बचता।
बस आज मन हल्का करने के लिए लिख दिया। कोई सलाह नहीं चाहिए, बस दिन ऐसा ही था।
