पिछले कुछ दिनों से रात को सोने का समय बहुत पीछे खिसकता जा रहा है।
बच्चों को सुला देने के बाद जो थोड़ा-सा समय अपने लिए मिलता है, उसमें मन ही नहीं भरता।
फिर पुराने फिल्म कैमरे से खींची तस्वीरें देखने बैठ जाती हूं, या यूं ही फ़ोन में समय कब निकल जाता है पता ही नहीं चलता।
दफ़्तर की टेंशन शायद शरीर में कहीं जमा होती रहती है, रात होते-होते भी दिमाग शांत नहीं होता।
मेरे साथ ही ऐसा हो रहा है शायद, पता नहीं जी।
आप सबका भी कभी ऐसा होता है क्या, रात गहरी होने पर भी नींद दूर ही भागती रहे?
