काम का स्ट्रेस अब शरीर पर सीधा दिखने लगा है।
पिछले कुछ हफ़्तों से ऑफिस में एक के बाद एक डेडलाइन चल रही है।
घर आकर भी बच्चों का होमवर्क, खाना, तैयारी, सब निपटाते-निपटाते रात कब गहरी हो जाती है पता ही नहीं चलता।
पहले जल्दी सो जाती थी, अब नींद का समय रोज़ थोड़ा और पीछे खिसकता जा रहा है।
और नींद कम हो तो सबसे पहले असर त्वचा पर दिखता है, ये मैंने खुद महसूस किया है।
जब से ठीक से सो नहीं पा रही, चेहरे पर खिंचाव और लालिमा वापस बढ़ गई है।
शायद मेरे मामले में ही ऐसा हो, पर स्ट्रेस और नींद का सीधा असर लगता है।
छुट्टी वाले दिन थोड़ा वक़्त निकालकर पुराने फ़िल्म कैमरे से मोहल्ले में घूमना ही एक तरह का सुकून है।
उतनी देर के लिए दिमाग़ पूरी तरह खाली हो जाता है।
बाकी हफ़्ता तो बस भागदौड़ में ही निकल जाता है।
बच्चे भी अब बड़े हो रहे हैं, उनकी अपनी माँगें बढ़ रही हैं, और ऑफिस का काम भी कम होने का नाम नहीं ले रहा।
ऐसे में खुद के लिए वक़्त निकालना कितना मुश्किल हो जाता है, ये यहाँ सबको शायद समझ ही आता होगा।
बस आज मन थोड़ा भारी था, इसलिए लिख दिया।
