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वहां कोई कुछ नहीं मांगता

कल सुबह 6 बजे निकली थी, अकेले पहाड़ी वाले रास्ते पर।

हफ्ते भर की भागदौड़ के बाद वो 1 घंटा सिर्फ अपना लगता है।

8 बजे तक लौटना पड़ा! दोपहर में एक शादी अटेंड करनी थी।

पिछले 2 हफ्ते से यही चल रहा है, या तो ट्रेक कैंसिल या आधा-अधूरा।

शादियों का सीजन है तो समझ तो आता है, पर मन थोड़ा उखड़ा हुआ रहता है।

बच्चे भी अब सुबह जल्दी उठ जाते हैं, अकेले निकलने का वक्त और कम हो गया है।

आज बेटी ने पूछा मुझे पहाड़ पर अकेले जाना क्यों अच्छा लगता है।

ठीक से जवाब नहीं दे पाई, बस इतना कहा, “वहां कोई कुछ नहीं मांगता।”

अगले हफ्ते फिर एक शादी है, वो 1 घंटा शायद फिर नहीं मिलेगा।

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