आज ऑफिस से लौटते हुए थकान इतनी हावी हो गई कि गाड़ी में बैठे-बैठे आंख लग गई।
घर पहुंचते ही बच्चों का होमवर्क, खाना, फिर कल की मीटिंग की तैयारी — एक के बाद एक चलता ही रहा।
पिछले कुछ हफ्तों से गर्दन और गालों पर लाल चकत्ते जैसे उभर आए हैं, और मुझे लगता है ये स्ट्रेस की ही देन है।
शायद मेरे साथ ही ऐसा हो रहा हो, पर शरीर सच में बता देता है जब मन ज़्यादा भार उठा रहा हो!
रात को सोने का टाइम भी अब खुद-ब-खुद खिसकता जा रहा है, लैपटॉप बंद करते-करते रात बहुत देर हो जाती है।
पति बोले, “थोड़ा अपने लिए भी वक्त निकाल लिया करो”, सुनने में आसान लगता है पर करना उतना आसान नहीं।
पिछले हफ्ते एक शाम कैमरा उठाकर गली में यूं ही निकल गई थी, बस उतनी देर के लिए दिमाग शांत लगा था।
वो सुकून ज़्यादा देर टिकता नहीं, अगले दिन फिर वही रूटीन शुरू हो जाता है।
पता नहीं कब तक ऐसे चलता रहेगा, बस आज मन हल्का करने के लिए सबको बता दिया।
