आज शाम दफ़्तर से लौटते हुए रास्ते में ही खीज होने लगी थी।
शाम को कैमरा लेकर बस यूं ही निकल जाने का मन था, पर वक्त ही नहीं मिल पाया।
घर पहुंचते ही बड़े बेटे ने किसी छोटी सी बात पर ज़िद पकड़ ली, और जितना धीरज रखना चाहिए था उतना मुझसे नहीं रखा गया। बाद में खुद को बहुत बुरा लगा।
काम का दबाव दिनभर मन में जमा होता रहता है, और घर पहुंचते ही जैसे वो सारा बोझ बच्चों पर उतर जाता है। पति भी देर से लौटते हैं तो अकेले दोनों को संभालना पड़ता है।
मेरे साथ ही शायद ऐसा ज़्यादा होता हो, ठीक से पता नहीं।
रात को सोने से पहले सोचती हूं कि आज फिर वही हुआ, कल से बेहतर करूंगी, पर अगली शाम फिर वही दोहराता है।
दोस्तों, आप लोग दिनभर की थकान और खीज को घर की दहलीज़ पर ही कैसे उतार पाते हैं?
