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थकान का गुस्सा बच्चों पर निकल जाता है

आज शाम दफ़्तर से लौटते हुए रास्ते में ही खीज होने लगी थी।

शाम को कैमरा लेकर बस यूं ही निकल जाने का मन था, पर वक्त ही नहीं मिल पाया।

घर पहुंचते ही बड़े बेटे ने किसी छोटी सी बात पर ज़िद पकड़ ली, और जितना धीरज रखना चाहिए था उतना मुझसे नहीं रखा गया। बाद में खुद को बहुत बुरा लगा।

काम का दबाव दिनभर मन में जमा होता रहता है, और घर पहुंचते ही जैसे वो सारा बोझ बच्चों पर उतर जाता है। पति भी देर से लौटते हैं तो अकेले दोनों को संभालना पड़ता है।

मेरे साथ ही शायद ऐसा ज़्यादा होता हो, ठीक से पता नहीं।

रात को सोने से पहले सोचती हूं कि आज फिर वही हुआ, कल से बेहतर करूंगी, पर अगली शाम फिर वही दोहराता है।

दोस्तों, आप लोग दिनभर की थकान और खीज को घर की दहलीज़ पर ही कैसे उतार पाते हैं?

कमेंट 3

  • मुस्कान02.27

    मैं पहले दरवाज़े के बाहर थोड़ा रुककर सांस लेती हूं, तब अंदर जाती हूं जी

  • निखार02.28

    यह बात बहुत समझ आती है, जी। बरसों से त्वचा की तकलीफ़ है और थकान बढ़े तो मन भी उतना ही चिड़चिड़ा हो जाता है, फिर बेटे की छोटी बात पर आवाज़ ऊंची हो जाती है और बाद में खुद पर बहुत बहुत गुस्सा आता है। पहला, दरवाज़े से पहले थोड़ी देर बालकनी में खड़े होकर सांस लेती हूं, दूसरा, हाथ में कोई काम पकड़ लेती हूं जैसे पौधों को पानी देना, पर सच कहूं तो हर शाम यह कामयाब नहीं होती। पति देर से आएं तो अकेले दोनों

  • सुहानी02.28

    मेरे साथ भी ऐसा होता है, दिनभर खड़े-खड़े काम करने के बाद शाम को इतनी थकान हो जाती है कि घर पहुंचकर मम्मी-पापा की किसी छोटी बात पर भी झुंझला जाती हूं, फिर बाद में खुद को बुरा लगता है

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