काम कभी इतना आ जाता है कि सांस लेने का टाइम नहीं मिलता, और कभी दिन भर कुछ नहीं होता।
यही सबसे थका देने वाला पार्ट है फ्रीलांसिंग का, मतलब बैलेंस कभी बनता ही नहीं।
आज सोच रही थी ब्रेड बनाऊं, आटा भी निकाल के रखा, फिर हाथ में ताकत ही नहीं बची।
खाता-बही भी फिर से लिखनी शुरू की थी इस महीने, बीच में ही छूट गई।
किसी एक चीज़ पर टिक के रहना मुश्किल हो रहा है आजकल, समझ नहीं आ रहा पहले क्या पकड़ूं।
आप लोगों के साथ भी होता है क्या ऐसा, काम का उतार-चढ़ाव थकान इतनी बढ़ा देता है।
