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आज सुबह से मन थोड़ा भारी है

आज सुबह से मन थोड़ा भारी है।

7 बजे उठी, दोनों बच्चों का टिफिन बनाया, स्कूल भेजा, फिर 9 बजे ऑफिस की मीटिंग में बैठ गई। सब कुछ time पर हुआ, पर अंदर से बिल्कुल खाली सा लग रहा था। बीच मीटिंग में एक colleague ने पूछा, “आज कुछ परेशान लग रही हो?” मैं बस मुस्कुरा दी, कुछ बोली नहीं।

पता नहीं कैसे बताऊं कि पिछले 2 महीने से जो चल रहा है वो (सिर्फ त्वचा की बात नहीं) है। सुबह mirror में देखती हूं तो लगता है जैसे कोई और खड़ा है।

शाम को दोनों बच्चे सो गए तो सोचा थोड़ा अपने लिए बैठूं, पर बैठते ही आंख लग गई। कल फिर वही routine शुरू।

इस weekend को लेकर मन में कई बातें हैं –
· trek पर जाने का मन तो बहुत है, पर पैरों में वो पहले वाली ताकत नहीं लग रही
· 3 शादी के कार्ड टेबल पर रखे हैं, इसी महीने के अंदर
· और साथ में रोज़ का वही ऑफिस-घर-बच्चे वाला चक्र

Raindrops on a window with a blurred view of buildings and trees outside, depicting a rainy and over

आखिर कब तक ऐसे चलता रहेगा, पता नहीं।

बस आज जो मन में था वो लिख दिया, [किसी सलाह की तलाश में नहीं हूं], बस थोड़ा हल्का करना था।

कमेंट 2

  • चांदनी02.15

    मिरर वाली बात बहुत सच लगी, मैं भी वहां से गुज़री हूं

  • गुलाबी02.15

    पैरों वाली बात सच में रिलेट हुई, बैठे बैठे बॉडी की स्ट्रेंथ कम हो जाती है

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