पूरे दिन दफ़्तर में निकल जाता है।
बच्चों को सुलाने के बाद जो थोड़ा समय बचता है, उसी में कुछ अपने लिए करने की सोचती हूं, पर ज़्यादातर वो समय भी फोन में ही निकल जाता है।

कल रात भी बच्चों को 10 बजे सुला दिया था, सोचा था खुद भी 11 बजे तक सो जाऊंगी।
लेकिन फोन में कुछ न कुछ देखते हुए घड़ी 1 बज गई।
पुराना फिल्म कैमरा भी करीब 3 हफ्ते से हाथ नहीं लगा पाई हूं। उठाने का मन तो होता है, पर रात तक इतनी एनर्जी ही नहीं बचती।
सुबह 6 बजे फिर उठना होता है, तो नींद 5 घंटे भी पूरी नहीं होती। ये पिछले 3 हफ्ते से लगातार हो रहा है, और अब दफ़्तर में भी ध्यान लगाना मुश्किल हो रहा है।
काम का तनाव तो है ही, पर रात को नींद क्यों नहीं आ रही, समझ नहीं आ रहा…
शायद मेरे साथ ही ऐसा हो रहा हो, पर दिनभर की थकान के बाद भी रात को दिमाग शांत क्यों नहीं होता, ये किसी को पता है क्या?
