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सुबह की चाय और थोड़ी सी शांति

आज सुबह जल्दी आंख खुल गई। बच्चे अभी सो रहे थे और घर में पूरा सन्नाटा था। चाय बनाई और बालकनी में जाकर बैठ गई।

कुछ नहीं किया, बस (अकेले) बैठी रही।

पिछले कुछ हफ्तों से भाग-दौड़ ही चल रही है –
– ऑफिस का काम
– बच्चों की स्कूल की तैयारी
– वीकेंड पर ट्रेक की प्लानिंग
– ऊपर से शादियों का सीज़न अलग

हर वीकेंड कहीं न कहीं जाना पड़ रहा है।

आज बस कुछ मिनट अकेली बैठी तो लगा जैसे बहुत दिनों बाद सांस ली हो। फोन भी साथ नहीं लाई थी, बस चाय और मैं।

फिर बेटी उठ गई और बोली-
“मम्मी क्या कर रही हो अकेले?”
मैंने कहा कुछ नहीं, बस बैठी हूं।

सोच रही हूं [सिर्फ अपने लिए] ऐसे थोड़े पल निकालना शुरू करूं। रोज़ नहीं तो हफ्ते में कभी-कभी सही।

आप लोग भी अपने लिए ऐसे कोई तरीका निकालते हैं क्या?

कमेंट 2

  • मुस्कान06.02

    सुबह वाला ये समय आपको रोज़ मिलता है या सच में हफ़्ते में कभी-कभार ही निकल पाता है

  • निखार06.03

    सुबह अकेले बैठे रहने वाले पल की बात बहुत समझ आई, मैं भी कभी-कभी सबके जागने से पहले बगीचे में यूं ही बैठ जाती हूं, बेटी ने पूछा और आपने कहा बस बैठी हूं, वो पढ़कर अपने बच्चों के छोटे होने के दिन याद आ गए, हफ्ते में कभी एक बार भी ऐसा वक्त मिल जाए तो मन हल्का हो जाता है, 2 बारा पूछूं तो आप सबका भी ऐसा कोई तरीका है क्या?

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