रविवार सुबह 7 बजे ट्रेक के लिए निकली, लेकिन इस बार फोन घर पर ही छोड़ दिया।
पहले 10 मिनट अजीब लगा। बार-बार जेब में हाथ जाता था, फोन ना मिले तो हल्की घबराहट सी होती।
फिर धीरे-धीरे भूल गई। रास्ते में पेड़ों की आवाज सुनी, हवा महसूस की, ये सब पहले शायद ध्यान ही नहीं जाता था।
2 घंटे का ट्रेक था। लौटकर देखा तो सच में दिमाग हल्का लग रहा था!
बेटी ने पूछा “मम्मी फोन कहां है?” तो बोली “आज उसे भी छुट्टी दी।”
काम, बच्चे, ऊपर से इतनी शादियां चल रही हैं आजकल, दिमाग कभी शांत नहीं होता। आज सिर्फ 2 घंटे के लिए सच में शांत था।
अगली बार भी ऐसे ही करूंगी शायद।
