आज पुराना रोल आखिरकार develop करवाया।
2-3 हफ्ते से कैमरे में पड़ा था, आज जाकर print निकलवाया।
सोचा था गली का मोड़, बच्चों का स्कूल gate, ऐसा कुछ अच्छा आया होगा।
पर आधे से ज़्यादा फोटो धुंधली निकलीं।
बड़ी बेटी ने photos देखते ही पूछा, “मम्मी ये सब blur क्यों है?”
मैं ठीक से जवाब नहीं दे पाई, बस हंस के बात टाल दी।
घर आकर सोच रही थी, हाथ शायद खींचते वक्त हिल गया होगा।
पिछले कुछ हफ्तों से नींद का टाइम भी लगातार पीछे खिसक रहा है।
पहले रात 11 बजे तक सो जाती थी, अब 1 बजे भी आँख नहीं लगती।
ऑफिस का काम है या बस उम्र का असर, ठीक-ठीक पता नहीं।
मेरे साथ ही ऐसा हो रहा हो शायद, पर हाथ अभी भी उतने स्थिर नहीं लगते जितने पहले थे।
कैमरा पकड़ते वक्त भी वो महसूस हुआ आज।
खैर, कोई बड़ी बात नहीं, बस आज print देखकर यही ध्यान आया तो लिख दिया।
सबको भी कभी ऐसा लगता है क्या, हाथ या दिमाग पहले जैसा साथ नहीं देता?
