आज ऑफिस से लौटते वक्त गली के मोड़ पर वही पुरानी कैमरा शॉप दिख गई, महीनों से बैग में पड़े 2 रोल आखिरकार जमा कर आई।
एक रोल तो शायद अप्रैल का है, ठीक याद भी नहीं कब भरा था। दुकान वाले भैया ने कहा 3 दिन में फोटो तैयार हो जाएंगी।
बच्चों को सुलाने के बाद जो 1-2 घंटे बचते हैं ना, वही असली अपना वक्त लगता है।
पर अजीब बात ये है कि हफ्ते दर हफ्ते वो वक्त और लेट खिसकता जा रहा है। पहले 10 बजे तक सो जाती थी, कल रात तो 12:40 बजे तक जागती रही!
काम का दबाव कुछ ज्यादा ही है इन दिनों, समझ नहीं आता नींद इतनी पीछे क्यों खिसक रही है।
सुबह बेटी ने पूछा ‘मम्मी आप रात को सोती क्यों नहीं?’ तो सीधा जवाब नहीं बन पाया मुझसे।
कैमरा लेकर अकेले गली में घूमना अच्छा लगता है, दिन भर की भागदौड़ में थोड़ी सांस वहीं से मिलती है।
किसी और का भी ऐसा होता है क्या, रात होते-होते नींद और पीछे खिसकती चली जाए?
