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कैमरा उठाया, घड़ी देखना भूल गई

बच्चों को सुलाने के बाद आजकल रात का यही एक टुकड़ा अपने लिए बचता है।

आज पुराने रोल की कुछ तस्वीरें देखने बैठी थी, गली के कोने वाले उस पुराने मकान की तस्वीर देर तक देखती रही।

देखते-देखते समय का हिसाब ही भूल गई, और जब घड़ी की तरफ नज़र गई तो सोने का समय बहुत पीछे छूट चुका था।

ऑफिस का काम इन दिनों दिमाग में इतना बैठा रहता है कि रात को भी पूरी तरह छूटता नहीं, शायद इसी वजह से देर तक जागने की आदत सी बन गई है।

कैमरा हाथ में लेकर तस्वीरें देखने का यह वक्त ही थोड़ी राहत जैसा लगता है, भले ही उसकी कीमत अगली सुबह की नींद से चुकानी पड़े।

बस आज इतना ही मन में आया, वैसे रात को अपने लिए ऐसा कोई छोटा वक्त आप सब भी निकाल पाते हैं क्या।

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