आज सुबह ऑटो वाले से बहस हो गई।
किराया ज़्यादा माँगा, मना किया तो सीधा मुँह बना लिया।
गुस्सा तो आया पर सोचा रहने दो, सुबह-सुबह क्यों बिगाड़ूं।
बच्चे साथ थे, वो भी चुप देख रहे थे।
वैसे भी आजकल शादियों का सीज़न चल रहा है, हर तरफ भागदौड़ है, इसी में एक और झंझट बढ़ गया।
घर पहुँचकर लगा असली गुस्सा कहीं और छुपा बैठा है, ऑटो वाला तो बस बहाना था।
ऐसा किसी और के साथ भी होता है क्या, या मैं ही ज़्यादा सोचती हूं
