आज शाम बेटे ने साइकिल चलानी सीख ली।
[बिना support wheels के], पहली बार।
शुरू में handle बहुत कसकर पकड़े हुए था, डरा हुआ लग रहा था।
पार्क में बैलेंस पकड़ने में करीब 20 मिनट लगे।
3 बार गिरा, घुटने पर हल्की खरोंच भी आई।
पर हर बार खुद उठा, फिर से चला दिया।
मैं बस बगल में खड़ी देखती रही, ज्यादा कुछ बोला नहीं गया मुझसे।
सुबह से ऑफिस का presentation था, फिर शाम को शादी वाली shopping list भी बाकी थी, दिमाग वैसे ही भरा हुआ था।
पर उन 20 मिनट में सब कुछ भूल गई।
बेटी भी साथ में थी, चिल्ला-चिल्ला कर guide कर रही थी –
“जल्दी पैडल मारो, गिरना मत”
शाम के 7 बज गए थे तब तक, पार्क में अंधेरा होने लगा था।
घर आते ही बेटे ने सबसे पहले पापा को फोन करके बताया।
अभी से बोल रहा है कल फिर से चलाएगा, बिना किसी की मदद के।
छोटी सी बात है, पर आज पूरे दिन में यही सबसे अच्छा पल था।
