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साथ चलें ›खुली गपशप

पुरानी फ़िल्म फोटो देख रही थी आज

आज दोपहर में यूं ही फ़ोन में गैलरी खंगाल रही थी।

पुराने फ़िल्म वाले स्कैन मिल गए, दफ़्तर से पहले के दिनों के।

उस वक़्त सुबह-सुबह अकेले निकल जाती थी बस कैमरा लेकर, कोई हड़बड़ी नहीं होती थी, कोई meeting का टेंशन नहीं होता था दिमाग में।

अब सुबह आंख खुलते ही सीधे बच्चों के टिफ़िन और अपने लैपटॉप के बीच फंस जाती हूं।

कैमरा अलमारी में ही पड़ा रहता है, कब से खोला ही नहीं याद नहीं।

बीच में यूं लगा जैसे कोई और लड़की थी वो फ़ोटो वाली, अभी वाली नहीं।

आजकल शाम को घर आकर भी दिमाग ऑफिस में ही अटका रहता है, कंधे अकड़े से रहते हैं वैसे भी।

फिर बेटी ने आवाज़ लगाई कि खाना कब लगेगा, तो फ़ोन रख दिया।

शाम का बाकी वक़्त वैसे ही निकल गया, बर्तन-वर्तन और होमवर्क में।

रात को बिस्तर पर भी बस यही सोच रही थी कि कभी weekend पर कैमरा निकालूंगी, हो सकता है।

फ़िलहाल तो बस इतनी सी याद ताज़ा हो गई आज, बाकी फिर देखते हैं।

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