पिछले कुछ हफ्तों से रात की नींद का समय पीछे खिसकता जा रहा है।
पहले करीब 11 बजे तक सो जाती थी, अब आजकल 1, कभी-कभी 2 बजे तक भी आंख नहीं लगती।
ऑफिस का काम पिछले महीने से अचानक बढ़ गया है, नई टीम मिली है और सब कुछ सीखने में ही दिन खत्म हो जाता है।
बच्चों को शाम को खाना खिलाकर, होमवर्क करवाकर, सुलाने के बाद ही थोड़ी शांति मिलती है, पर उस वक्त तक खुद इतनी थकी होती हूं कि फिर लैपटॉप खोलने का मन ही नहीं करता, फिर भी खोलना पड़ता है।
एक बेटा 9 साल का है, दूसरी बेटी 6 साल की, दोनों को अभी हर छोटी बात में मां चाहिए, ये समझ आता है, बस कभी-कभी खुद के लिए एक घंटा भी नहीं बचता।
पहले वीकेंड पर पुराना फिल्म कैमरा लेकर आस-पास के मोहल्ले में निकल जाती थी, कुछ न कुछ खींच लाती थी, वो शौक अब करीब 3 हफ्ते से बंद पड़ा है।

कैमरा बैग वहीं रखा है, बस उठाने का मन नहीं बन रहा।
शरीर भी शायद इसी थकान और तनाव की वजह से थोड़ा अजीब रिएक्ट करने लगा है, ये खुद महसूस हो रहा है, पर उस बारे में फिर कभी अलग से लिखूंगी।
मेरे केस में शायद उम्र का भी हिस्सा है, 40 पार करने के बाद पहले जितनी रिकवरी जल्दी नहीं होती।
सुबह 6 बजे उठना, दिन भर ऑफिस, फिर रात को फिर से काम, ये रूटीन कब तक चलेगा पता नहीं।
बस आज मन थोड़ा भारी था इसलिए सबको अपनी हालत बता दी।
