कुछ हफ्तों से रात को सोने का समय लगातार पीछे खिसकता जा रहा है। पहले रात को जल्दी सोने की कोशिश करती थी, पर अब वो आदत भी टूट गई है।
बच्चों को खाना खिलाना, होमवर्क करवाना, स्कूल के लिए अगले दिन की तैयारी – यह सब निपटाने के बाद जब थोड़ी देर खुद के लिए बैठती हूं, तो फोन उठा कर ऑफिस के मैसेज फिर से पढ़ना शुरू हो जाता है। दिन में जो काम अधूरा रह गया था, वो रात को दिमाग में घूमता रहता है।
कल भी यही हुआ। लैपटॉप बंद करके लेटी, फिर सोचा थोड़ी देर फोन देख लूं, और पता ही नहीं चला कि कितनी देर बीत गई। सुबह उठने का समय वैसा ही रहता है, बस नींद कम होती जा रही है।
पिछले कुछ समय से हाथ की त्वचा फिर से रूखी होने लगी है, बीच-बीच में खुजली भी होती है। डॉक्टर कुछ बोलें उससे पहले ही समझ आ जाता है कि यह स्ट्रेस की वजह से है, क्योंकि हर बार यही पैटर्न दोहराता है।

वीकेंड पर फिल्म कैमरा लेकर आस-पड़ोस में निकलना मुझे हमेशा से पसंद रहा है। पर पिछले कुछ समय से कैमरा वैसे ही अलमारी में पड़ा है। बाहर निकलने का मन ही नहीं करता, बस घर पर पड़े रहने का मन करता है।
बच्चों के साथ, ऑफिस के साथ, दिन कैसे निकल जाता है समझ ही नहीं आता। और रात को जो थोड़ा समय बचता है, वो भी असल में आराम का समय नहीं होता, बस थकान में बीत जाता है।
आजकल सब कुछ थोड़ा भारी सा लग रहा है।
