आज सुबह ट्रेक पर एक माँ अपनी छोटी बेटी को कंधे पर बिठाए चढ़ रही थी।
बेटी बीच-बीच में हाथ उठाकर बादल छूने की कोशिश कर रही थी। मुझे अपनी दोनों बेटियां याद आ गईं।
सच कहूं तो सुबह घर से निकलते वक्त दोनों से ठीक से बात भी नहीं हुई थी। जल्दी में टिफिन पैक करके निकल गई।
ऊपर पहुंचकर थोड़ी देर बस बैठी रही। हवा अच्छी थी! नीचे शहर धुंधला सा दिख रहा था।
फिर सोचने लगी, हफ्ते भर काम और घर में ही निकल जाता है। ट्रेक ही वो एक समय है जब दिमाग थोड़ा शांत होता है।
लौटते वक्त वही मां-बेटी फिर मिलीं। बेटी अब सो चुकी थी, मां के कंधे पर सिर टिकाए। मैंने बस मुस्कुरा दिया, कुछ बोली नहीं।
घर पहुंचकर सीधे दोनों को गले लगाया। बच्चियां थोड़ी हैरान हुईं, पूछने लगीं क्या हुआ। मैंने बस इतना कहा, कुछ नहीं, बस याद आ रही थी।
