शनिवार को ट्रेक पर निकली थी, आधे रास्ते से वापस आना पड़ा। छोटे को हल्का बुखार था, सुबह ठीक लग रहा था इसलिए निकल गई थी। बीच पहाड़ी पर फोन आया, तुरंत वापसी करनी पड़ी।
हफ्ते भर में बस यही एक दिन होता है जो सिर्फ मेरे लिए होता है। वो भी पूरा नहीं मिला।
घर आकर बच्चे को दवा दी, थोड़ी देर पास बैठी रही। फिर ऑफिस का पेंडिंग काम याद आया, वो भी निपटाना पड़ा। रात तक पैर भी दर्द कर रहे थे, दिमाग भी शांत नहीं हो रहा था।
पति ने कहा,
“अगली बार मैं देख लूंगा, तू जा।”
पता नहीं अगली बार कब आएगा। इस हफ्ते तो पूरा हिसाब ही बिगड़ गया।
बच्चों के साथ रहना अच्छा लगता है, इसमें कोई शक नहीं। बस कभी-कभी लगता है (अपने लिए) कुछ बचता ही नहीं।
