कल शाम ट्रेक से लौटी तो पैर बिल्कुल जवाब दे गए थे।
3 घंटे की चढ़ाई थी, ऊपर से बीच में मौसम भी बिगड़ गया, उफ़।
घर पहुंचते ही बच्चों ने घेर लिया, “मम्मी कहां थी इतनी देर तक!”
कोई रेस्ट नहीं मिला, सीधा किचन में।
रात 11 बजे तक टिफिन पैक करती रही, होमवर्क चेक किया।
सोचा था संडे को थोड़ा सुकून मिलेगा, वो भी नहीं हुआ।
आज सुबह 6:30 अलार्म बजा और लगा जैसे नींद हुई ही नहीं।
ऑफिस की पहली कॉल 9:15 पर थी, उससे पहले दोनों बच्चों को तैयार करना, टिफिन देना, सब साथ में।
कभी-कभी सोचती हूं ट्रेक अपने लिए जाती हूं, पर लौटते ही वो (सुकून वाला हिस्सा) कहीं गायब हो जाता है।
अगली बार शायद छोटा रूट ही लूं, या संडे को कुछ प्लान ही ना करूं।
फिलहाल आज का दिन बस किसी तरह निकल रहा है।
