आजकल रात को नींद टाइम पर नहीं आ रही।
पहले जल्दी आंख लग जाती थी, अब बच्चों को सुलाने के बाद भी काफी देर तक बस यूं ही जागी रहती हूं।
फोन उठाकर कुछ खास देखती भी नहीं, बस स्क्रॉल करती रहती हूं। कभी-कभी बालकनी में जाकर यूं ही खड़ी हो जाती हूं, गली की लाइट देखते हुए।

पिछले हफ्ते एक रात ऐसे ही पुराना फिल्म कैमरा उठाकर नीचे गली में चली गई थी, बस यूं ही चक्कर लगाने के लिए। कुछ खींचा भी नहीं, बस घूमकर वापस आ गई।
दिन में बच्चों के पीछे भागते-भागते थक जाती हूं, फिर भी रात को दिमाग शांत नहीं होता। ऑफिस का काम भी शायद कहीं ना कहीं दिमाग में घूमता रहता है, भले ही सीधे उसके बारे में सोच नहीं रही होती।
सुबह उठकर लगता है नींद पूरी नहीं हुई, पर दिन फिर वैसे ही शुरू हो जाता है। मेरे केस में शायद स्ट्रेस ही वजह हो, पर पक्का नहीं कह सकती।
बस यही चल रहा है इन दिनों, धीरे-धीरे सोने का टाइम पीछे खिसकता जा रहा है।
