आजकल नींद वक्त पर नहीं आती।
लैपटॉप बंद करने के बाद भी दिमाग में दिन भर की मीटिंग्स घूमती रहती हैं।
बच्चों को सुलाने के बाद थोड़ी देर बालकनी में यूं ही बैठी रहती हूं।

ठंडी हवा लगती है तो मन थोड़ा हल्का लगता है।
कई हफ्तों से पुराना फिल्म कैमरे वाला रोल भी डेवलप करवाने नहीं जा पाई।
रोल में मोहल्ले की कुछ पुरानी गलियों की तस्वीरें हैं जो शायद अब वैसी नहीं दिखतीं।
रोज सोचती हूं कि कल जल्दी सो जाऊंगी और काम को दिमाग से निकाल दूंगी।
अगले दिन फिर वही सिलसिला दोहराता है।
शायद सबका भी ऐसा ही होता होगा दफ़्तर के बाद।
शरीर पूरे दिन थका हुआ ही महसूस होता है।
