← सूची

साथ चलें ›खुली गपशप

पहाड़ चढ़ते हुए सांस फूलने लगी

आज वीकेंड ट्रेक पर सांस बुरी तरह फूलने लगी।
पहले ऐसा नहीं होता था।

बीच रास्ते में रुककर सोचने लगी, उम्र हो रही है शायद।
या फिर नींद पूरी नहीं होती इसलिए शरीर साथ नहीं दे रहा।

बच्चों को स्कूल भेजना, ऑफिस का काम, फिर वीकेंड पर पहाड़।
कहीं न कहीं शरीर चीख-चीखकर बता रहा है (थोड़ा धीमा चलो)।

पर रुकने का मन भी नहीं करता।
ऊपर पहुंचकर जो हवा मिलती है, वो सब भुला देती है।

नीचे उतरते वक्त सोच रही थी, अगली बार थोड़ा हल्का बैग लेकर जाऊंगी।
और शायद बीच में ज़्यादा देर रुककर सांस ठीक कर लूंगी।

घर पहुंचकर बच्चों ने पूछा (मम्मी थक गईं क्या), मैंने बस सिर हिला दिया।

टिप्पणियाँ 0

  • अभी कोई टिप्पणी नहीं।
सभी पोस्ट देखें →