कल रात फिर हाथ की कलाई खुजाते-खुजाते नींद टूट गई।
ये पिछले कुछ हफ्तों से रोज़ का हिस्सा बनता जा रहा है, ऑफिस में जब से नया प्रोजेक्ट सिर पर आया है तब से स्ट्रेस भी बढ़ गया है और साथ में यही सब भी बढ़ गया लगता है।
सुबह बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करते-करते दिमाग पहले से ही थका हुआ लगता है।
फिर ऑफिस पहुंचते ही मीटिंग्स की लाइन लग जाती है, बीच में सांस लेने का भी मौका नहीं मिलता।
शाम को थोड़ा मन हल्का करने के लिए पुराना फिल्म कैमरा उठाकर गली में निकल गई थी।
पड़ोस की वही पुरानी दीवारें, वही मोड़, देखकर कुछ देर के लिए अजीब सुकून मिल जाता है।
पर रात होते ही फिर वही चक्कर शुरू हो जाता है।
त्वचा में खुजली, मन में काम की ही बातें घूमती रहती हैं, और सोने का टाइम पता नहीं कब का कब खिसकता जा रहा है।
शायद मेरे ही रूटीन की गड़बड़ी की वजह से ज़्यादा हो रहा हो, दूसरों के साथ ऐसा ना भी हो।
पता नहीं सबके साथ ऐसा होता है, मेरे साथ शायद थोड़ा ज़्यादा ही है।

बस आजकल हर रात यही लगता है कि दिन कब खत्म हुआ पता ही नहीं चला, और थकान वहीं की वहीं रह जाती है।
