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काम का स्ट्रेस शरीर पर दिखने लगा

आजकल ऑफिस से निकलते-निकलते रात के 10 बज जाते हैं।

घर पहुंचती हूं तो बच्चे दोनों सो चुके होते हैं, थोड़ी देर उनका चेहरा देखकर ही दिन खत्म होता है।

पिछले कुछ दिनों से नींद और पीछे खिसकती जा रही है, कल रात 1 बजे तक भी आंख नहीं लगी।

सुबह उठी तो आईने में चेहरा उतरा हुआ सा लग रहा था, जैसे शरीर अंदर ही अंदर थक कर जवाब दे रहा हो।

काम की डेडलाइन कभी खत्म ही नहीं होती, घर आकर भी दिमाग वहीं अटका रहता है!

पिछले रविवार थोड़ी देर के लिए पुराना फिल्म कैमरा लेकर गली में निकली थी, बस वही एक पल था जब सब कुछ थोड़ा हल्का लगा।

बाकी दिन तो बस भागते-भागते निकल जाते हैं, ठीक से ना खाना बन पाता है ना खुद के लिए वक्त।

मेरे मामले में शायद ये सिर्फ इन दिनों की बात हो, पर लगता है ऐसे फेज़ शायद सबकी जिंदगी में आते ही होंगे।

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