आजकल रात को सोने का टाइम पीछे खिसकता जा रहा है।
ऑफिस का काम खत्म करके भी दिमाग वहीं अटका रहता है, बिस्तर पर लेटने के बाद भी।
कल शाम थोड़ा जल्दी निकल गई घर से, बच्चों को उनके पापा के पास छोड़कर अकेले गली में घूम आई।
पुराना फिल्म कैमरा साथ लिया था, बस यूं ही।
गली के कोने वाली चाय की दुकान, पड़ोस का कुत्ता, बिजली के तार पर बैठी चिड़िया, सब कुछ खींच लिया।
पता नहीं क्यों पर उस थोड़ी देर में दिमाग खाली सा हो गया था, शायद मेरे साथ ही ऐसा होता हो।
रोल अभी डेवलप नहीं हुआ, पता नहीं फोटो कैसी आई होगी, पर वो शाम अच्छी थी।
काम का प्रेशर कम नहीं होगा, ये पता है।
पर शायद हफ्ते में एक शाम ऐसे निकालनी पड़ेगी, सिर्फ अपने लिए।
बच्चे सो गए थे जब घर लौटी, वरना शायद निकलना भी मुश्किल होता।
