आज पूरा दिन ऑफिस में मीटिंग पे मीटिंग लगी रही।
सुबह से शाम हो गया, ठीक से पानी पीना भी याद नहीं रहा।
घर पहुंची तो दोनों बच्चे दरवाज़े पे ही खड़े मिल गए, कुछ बताने के लिए एकदम बेताब।
थकान इतनी थी कि सोचा बस बैग रखकर सीधा लेट जाऊं।
पर उनकी शक्ल देखकर मन नहीं माना।
थोड़ी देर फर्श पे बैठकर उनकी सारी बातें सुनीं, स्कूल की, दोस्तों की, न जाने क्या-क्या।
अजीब है ना, दिनभर की थकान में भी वो थोड़ी देर सबसे अच्छी लगी!
बाकी सब भूल गई थी उस वक़्त।
अब बैठी हूं सबको सुलाकर, चाय का कप हाथ में लिए, और लग रहा है कल फिर वही दिन दोहराएगा।
वीकेंड का ट्रेक भी अभी सोच नहीं पा रही, इतना काम इकट्ठा हो गया है।
