रात को फिर नींद टूट गई।
खुजली इतनी बढ़ गई थी कि खुद को रोकना मुश्किल हो रहा था।
सुबह उठी तो थकान वैसी की वैसी लग रही थी।
बच्चों को तैयार करना, फिर ऑफिस के लिए भागना, बीच-बीच में क्रीम लगाना – सब साथ-साथ चल रहा है।
कोई एक चीज भी ठीक से हो जाए तो राहत मिलती है।
इन दिनों शादियों की भरमार लगी हुई है।
हर हफ्ते किसी न किसी का कार्ड आ ही जाता है।
जाना भी है, (हाथ ढकना) भी है, और मुस्कुराकर मिलना भी है।
सामने वाले को कुछ पता नहीं चलने देना, ये सबसे मुश्किल हिस्सा है।
सच कहूं तो अभी बस शुरुआत ही की है इस पूरे मामले में।
समय पर क्रीम लगाना, ठीक से सोना – ये सब अभी सीख ही रही हूं।
पर रात की (खुजली) किसी तरह रुकती ही नहीं।
वीकेंड पर ट्रेक पर जाने का मन बहुत था।
पर थकान ने घर से निकलने ही नहीं दिया।
सामान भी पैक करके रखा था, फिर भी नहीं गई।
कभी-कभी लगता है सब कुछ साथ संभालना बहुत भारी हो गया है।
काम, बच्चे, और अपनी ये हालत – तीनों एक साथ थाम पाना आसान नहीं लगता।
बस आज मन बहुत भारी था तो लिख दिया।
