सुबह से मन थोड़ा भारी है.
ट्रेक ग्रुप का प्लान बहुत पहले से फिक्स था. हफ्ते में बस वही सुबह होती है जब सच में अपने लिए निकल पाती हूं. बच्चों को संभालना, ऑफिस का काम, घर का रूटीन — बीच में सांस लेने जैसी लगती है वो सुबह.
अभी पता चला उसी दिन करीबी सहेली की शादी भी है.
बुलावा आ चुका है, ना कहना ठीक नहीं लगेगा. ग्रुप में भी बता दिया था कि आऊंगी, अब पीछे हटना उनको भी अटपटा लगेगा शायद.
बच्चों को कौन देखेगा, ये सवाल अलग से खड़ा है.
दोनों तरफ एक साथ पहुंचना नहीं हो पाएगा, ये तो साफ दिख रहा है…
समझ नहीं आ रहा किसको [ना] कहूं — अपने वाले समय को, या रिश्ते-नाते को? कैसे तय करते हैं ऐसे में?
