आज सुबह 5:30 बजे उठकर पास वाली पहाड़ी पर अकेले निकल गई।
बच्चे अभी सो ही रहे थे। घर पर उनको छोड़कर जाना अजीब लगता है, पर आजकल हर वीकेंड किसी न किसी की शादी है। बीच में ये अकेला समय ना मिले तो सांस ही नहीं आती।
रास्ते में कोई खास भीड़ नहीं थी।
– हवा में हल्की ठंडक थी, बारिश के बाद जैसी।
– ऊपर पहुंचकर एक पत्थर पर बैठ गई, कुछ देर बस चुप रही।
– नीचे शहर धीरे-धीरे जगता दिख रहा था।
कुछ देर के लिए फोन भी साथ नहीं ले गई। कुछ अलग सा हल्कापन महसूस हुआ, बता नहीं सकती ठीक से।
लौटकर आई तो घर में सब उठ चुके थे, वही रोज़ की भागदौड़ शुरू हो गई। पर वो थोड़ी देर की चुप्पी दिनभर साथ रहती है, ऐसा लगता है।
इस महीने अभी और शादियां बाकी हैं, तो अगला ट्रेक कब होगा पता नहीं। पर आज वाला काफी था।
