शाम की शिफ्ट खत्म होते-होते पैरों में भारीपन लगने लगता है। खड़े रहकर काम करने वाली नौकरी है, तो टखनों के पास सूजन भी साफ दिख जाती है।
पिछले 3 दिन से रात को सोने से पहले गुनगुने पानी में पैर डालकर बैठ रही हूं। पहले दिन सिर्फ 10 मिनट बैठ पाई थी, कल रात करीब 20 मिनट बैठी रही।
सूजन पूरी तरह कम नहीं हुई है, पर सुबह जूते पहनते वक्त थोड़ा हल्का जरूर लगा। नमक डालने से फर्क पड़ता है शायद, अभी पक्का नहीं कह सकती।
बीच-बीच में मन भारी हो जाए तो पिछवाड़े की छोटी क्यारी में जाकर थोड़ी देर सब्जियां देख आती हूं, वो भी किसी थेरेपी जैसा लगता है।
हिसाब की डायरी भी इसी हफ्ते से 2 बारा शुरू की है, दिन खत्म होते-होते पैसे और पैर दोनों का हिसाब साथ में लिख लेती हूं।
देखते हैं कितने दिन यही रूटीन चलता है।
