आज ऑफिस से निकलते-निकलते 9 बजे गए।
रास्ते में एक शादी वाला हॉल पूरी लाइटों से जगमगा रहा था।
गाड़ी में बैठे-बैठे बस देखती रही।
इस महीने शादियां ही शादियां लगी हैं।
इस वीकेंड वाला ट्रेक भी कैंसिल करना पड़ा, एक और शादी बीच में आ गई।
साड़ी-सूट अभी तक नहीं निकाला, वहीं सोच रही थी।
घर पहुंची तो बेटी अभी तक जाग रही थी।
बोली- “मम्मी आज लेट क्यों?”
कुछ नहीं बताया, बस गले लगा लिया।
बेटे को तो नींद आ गई थी टीवी के सामने ही।
उसे उठाकर बेड तक ले जाने में आधी ताकत निकल गई।
किचन में गई तो बर्तन वैसे ही पड़े थे।
सोचा कल सुबह देख लूंगी, अभी नहीं।
क्रीम लगाने का मन नहीं था, फिर भी लगा ली।
कहीं ना कहीं आदत बन गई है अब।
बस बैठकर थोड़ी देर कुछ नहीं किया।
ना फोन, ना टीवी, बस यूं ही।
कभी-कभी दिन इतना भागा हुआ होता है कि रात को थोड़ा रुकना ही सुकून लगता है।
