सुबह 6 बजे अकेले पहाड़ पर निकल गई। बहुत दिनों बाद।
पिछले कुछ हफ्तों से घर में शादियों का सीजन चल रहा है। अभी भी कुछ शादियां बाकी हैं। बीच-बीच में बच्चों का स्कूल का काम भी रहता है। weekend भी ठीक से weekend नहीं लगता आजकल।
आज सुबह अचानक नींद खुल गई। घर में सब सो रहे थे। बस चुपचाप निकल गई।
रास्ते में हवा ठंडी थी। पत्तों पर ओस थी। ऊपर पहुंचकर कुछ देर बस बैठी रही, कुछ सोचा भी नहीं।
पहले लगता था trek के बाद स्किन और flare होगी, इसलिए काफी दिनों से जाना टाल रही थी। पर आज हिम्मत करके निकल गई।
अच्छा लगा। शरीर से ज़्यादा दिमाग हल्का हुआ, ऐसा महसूस हुआ।
नीचे उतरते वक्त बस यही सोच रही थी कि (खुद के लिए थोड़ा वक्त) निकालना कितना ज़रूरी है। recovery अभी शुरुआत में है, तो शायद इसका भी अपना हिस्सा है इसमें।
घर आकर सीधा बच्चों का नाश्ता बनाने लग गई। पर वो सुबह वाला सुकून दिन भर साथ रहा।
