
आज सुबह से पूरा दिन उलझा रहा।
बच्चों को school भेजने के बाद सोचा था थोड़ा अपने लिए time निकालूंगी।
तभी office से call आया, meeting shift हो गई।
दोपहर में फिर से बदल गई।
आज कुल 3 बार schedule बदला।
शाम को एक colleague बोली, “आजकल हर दिन ऐसा ही चलता है क्या तेरा?”
मैं बस चुप रह गई, जवाब नहीं दिया।
सच पूछो तो पता नहीं कब से ऐसा चल रहा है।
पहले लगता था घर और office दोनों साथ मैनेज हो जाएंगे ठीक से।
अब समझ आता है कि रोज़ अपने हिसाब से कुछ नहीं होता।
बेटी ने सुबह पूछा था, “मम्मी इस weekend पहाड़ पर चलोगी क्या?”
मैंने हां बोल दिया था बिना सोचे।
अब लग रहा है पहले schedule देख के बोलना चाहिए था।
फिर भी weekend पर पहाड़ जाने का plan अभी टिका हुआ है।
बस उम्मीद है इस बार टिक जाए।
