इस हफ्ते एक पुरानी सहेली की शादी में गई थी।
अकेले।
बच्चे पापा के पास रह गए घर पर, मैं अकेली निकली फंक्शन के लिए।
वरना हमेशा हाथ पकड़े रहती हूं, शादी हो या बाजार।
इस बार हाथ [खाली] थे।
अंदर जाकर जहां मन किया वहां बैठ गई।
खाना भी आराम से खाया, गरम गरम।
बीच में उठकर किसी को ढूंढना नहीं पड़ा, कुछ दिलाना नहीं पड़ा।
सहेलियों से बात भी पूरी हुई, बीच में कोई टोकने वाला नहीं था।
शुरू में थोड़ा अजीब लगा, इतनी जगह अपने लिए क्यों है।
फिर लगा ये पहला मौका था जब (सिर्फ अपने हिसाब से) बैठी, उठी, खाई।
वीकेंड की पहाड़ वाली सैर अलग है, वहां का अकेलापन मेहनत वाला होता है।
ये उससे अलग तरह का अकेलापन था।
ऑफिस, घर, बच्चे, शादियों की भागदौड़ में ऐसे पल वैसे मिलते ही नहीं।
शाम को घर लौटते हुए भी वो हल्कापन साथ रहा।
बस इतना ही बताना था आज।
