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अकेले शादी में जाना कैसा लगा

इस हफ्ते एक पुरानी सहेली की शादी में गई थी।
अकेले।
बच्चे पापा के पास रह गए घर पर, मैं अकेली निकली फंक्शन के लिए।

वरना हमेशा हाथ पकड़े रहती हूं, शादी हो या बाजार।
इस बार हाथ [खाली] थे।
अंदर जाकर जहां मन किया वहां बैठ गई।

खाना भी आराम से खाया, गरम गरम।
बीच में उठकर किसी को ढूंढना नहीं पड़ा, कुछ दिलाना नहीं पड़ा।
सहेलियों से बात भी पूरी हुई, बीच में कोई टोकने वाला नहीं था।

शुरू में थोड़ा अजीब लगा, इतनी जगह अपने लिए क्यों है।
फिर लगा ये पहला मौका था जब (सिर्फ अपने हिसाब से) बैठी, उठी, खाई।

वीकेंड की पहाड़ वाली सैर अलग है, वहां का अकेलापन मेहनत वाला होता है।
ये उससे अलग तरह का अकेलापन था।
ऑफिस, घर, बच्चे, शादियों की भागदौड़ में ऐसे पल वैसे मिलते ही नहीं।

शाम को घर लौटते हुए भी वो हल्कापन साथ रहा।
बस इतना ही बताना था आज।

टिप्पणियाँ 2

  • गुनगुन09.22

    हाथ खाली थे वाली लाइन पढ़कर रुक गई, कितना सटीक कहा है आपने। दुकान अकेले देखती हूं तो अकेलापन तो रोज़ का साथी है, पर वो मजबूरी वाला होता है, जो आपने लिखा वो चुनकर लिया गया अकेलापन था, फर्क साफ समझ आया। एक शादी में अकेली गई थी क्योंकि घर वाले व्यस्त थे, तब भी यही लगा कि खाना आराम से गरम गरम खा पाई, जल्दी नहीं थी किसी बात की। शाम को घर लौटते वक्त वो हल्कापन आपके कितनी देर टिका, या दरवाज़े के अंदर

  • → गुनगुनखुशबूलेखक09.22

    मजबूरी वाला और चुनकर लिया वाला अकेलापन, ये फर्क सच में सोचने वाला है जी। मैं अभी अपने लिए वक्त निकालना सीख ही रही हूं, अकेले बैठना अब भी थोड़ा अजीब लगता है

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