आज ऑफिस से लौटी तो थोड़ी देर हो गई थी।
घर पहुंची तो देखा बेटी ने खुद रोटी बना ली थी।
(पहली बार) बनाई थी उसने, वो भी अकेले।
आटा थोड़ा गीला था, आकार भी टेढ़े थे।
पर स्वाद ठीक ही निकला था।
मन थोड़ा भर आया सच में।
मुझे लगता रहता है कि मैं उन दोनों को पूरा टाइम नहीं दे पा रही।
काम भी है, ऊपर से यह त्वचा वाली परेशानी अलग से खींचती रहती है।
बेटा बगल में बैठकर देख रहा था और बीच बीच में सलाह भी दे रहा था।
दोनों को देखकर लगा कि बच्चे खुद ही बहुत कुछ सीख जाते हैं।
हमें पता भी नहीं चलता।
कल फिर वीकेंड है और शादी में जाना है।
ट्रेक इस हफ्ते फिर छूट गया।
पर आज वाली बात मन में देर तक रही।
बस आज का दिन ऐसा ही रहा।
