आज रात खाने के बाद फिर से वही पुरानी डायरी निकाली, हिसाब लिखने वाली।
3 महीने से यूं ही पड़ी थी, बीच में एक पन्ना भी नहीं भरा गया।
काम से आकर पैर एकदम भारी लग रहे थे, टखनों तक सूजे हुए, तो सोचा टहलने की बजाय बैठकर हिसाब ही ठीक कर लूं।
लिखते-लिखते पता चला कितना यूं ही खर्च हो गया है, महीने के बीच का हिसाब तो रखा ही नहीं था।
बाहर हवा में अब वो हल्की ठंडक आने लगी है, हाथों की त्वचा भी थोड़ी खिंचने लगी है, पर वो बात फिर कभी।
टेरेस वाली सब्ज़ियां भी इस हफ्ते तोड़नी हैं, वरना ज़्यादा पक जाएंगी।
बस डायरी में हिसाब लिखने बैठी थी, बाकी सब यूं ही बीच में घुस आया।
