कल रात नींद बिलकुल नहीं आई।
बेटा बुखार में था, पूरी रात उसी के सिर पर हाथ रखे बैठी रही।
सुबह सिर्फ 4 घंटे की नींद के साथ ऑफिस निकलना पड़ा।
मीटिंग में हाल ये था कि आंखें बार-बार बंद हो रही थीं।
बॉस कुछ बोल रहे थे, सुनाई तो दिया मगर दिमाग में कुछ गया ही नहीं।
साथ बैठी कलीग ने चुपके से पूछा,
“ठीक हो न?”
हां कह तो दिया मगर अंदर से बिलकुल ठीक नहीं थी।
घर आते-आते ऑटो में भी झपकी लग गई।
ड्राइवर ने आवाज़ देकर उठाया, थोड़ी शर्मिंदगी सी हुई।
बेटा अब ठीक है, बुखार उतर गया है।
पर एक रात की नींद टूटने का असर अब 2 दिन तक क्यों रहता है, समझ नहीं आता।
पहले ऐसा नहीं होता था।
बेटी ने आज सुबह अपना टिफिन खुद पैक किया, वो अलग से अच्छा लगा।
वीकेंड पर ट्रेक का प्लान था, अभी उसे टाल दिया है।
अगले हफ्ते एक शादी भी है, उसकी तैयारी अलग से बाकी है।
काम अभी भी पूरा नहीं हुआ, कल फिर से जल्दी उठना है।
थोड़ा आराम जरूरी है फिलहाल।
