आज सुबह सब्ज़ी लेने अकेली निकली थी।
रास्ते में अचानक कॉलेज वाली सहेली मिल गई, ठेले के पास ही।
पहचानने में एक पल लगा, सच में।
(8 साल) बाद देखी थी उसे जी!
बाल थोड़े छोटे कर लिए थे बस, बाकी वैसी ही लगी।
दोनों वहीं खड़े हो गए फिर।
बच्चों की बात हुई, काम की बात हुई।
आधे घंटे से ऊपर हो गया शायद, पता ही नहीं चला।
घर लौटते हुए बस यही लगता रहा –
कैसे साल निकल जाते हैं, पता भी नहीं चलता।
कल तक जो रोज़ साथ थे वो अब अपने-अपने घर में उलझे हैं।
सोच रही हूं अगली बार वीकेंड ट्रेक पर बुला लूं उसे भी।
नंबर ले लिया है इस बार।
खोना नहीं है फिर से।
