शनिवार सुबह ट्रेक का पूरा प्लान बना रखा था।
जूते भी रात को ही निकाल कर रख दिए थे।
सुबह उठी तो बाहर झमाझम बारिश हो रही थी।
मौसम ऐप पर भी दोपहर तक यही हाल दिखा रहा था।

थोड़ी देर खिड़की के पास खड़ी रही।
बस यही सोचती रही कि हफ्ते भर का इंतज़ार यूं ही निकल गया।
फिर घर के काम में लग गई।
नाश्ता, टिफ़िन, बच्चों को तैयार करना, वही रोज़ वाला रुटीन।
बेटी बार-बार पूछती रही,
“मम्मी आज पहाड़ नहीं गए?”
मैंने बस हंस कर टाल दिया।
दोपहर तक बारिश थोड़ी कम हुई तो बालकनी में चाय लेकर बैठ गई।
ठंडी हवा अच्छी लग रही थी, पहाड़ जैसी ना सही।
शाम को सोचा अगले वीकेंड फिर कोशिश करूंगी।
शादियों का सीज़न भी सिर पर है, पता नहीं कब निकलना हो पाएगा।
फिलहाल इतना ही ठीक है, थोड़ा रुक कर फिर निकलेंगे।
