इस हफ्ते से एक नई कोशिश शुरू की है। घर वाले उठने से पहले अकेले उठकर बैठती हूं। बस चाय बनाकर बालकनी में खड़ी हो जाती हूं।
कोई शोर नहीं, कोई मांग नहीं। बस अपने लिए थोड़ा समय।
पहले दिन नींद पूरी नहीं हुई थी। सिर भी भारी लग रहा था।
अब धीरे-धीरे आदत बन रही है। बच्चों के उठते ही जो भागदौड़ शुरू होती है, उसके पहले मन [थोड़ा शांत] रहता है।
ऑफिस का काम, बच्चों का स्कूल, शादियों का सीज़न, सब साथ चल ही रहा है। बस दिन की शुरुआत अब अपनी तरह से होती है।
रात को जल्दी सोना अब भी नहीं हो पाता। वो अलग मुश्किल है।
पर सुबह का वो थोड़ा सा समय फिलहाल अच्छा लग रहा है।
