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शादियों के सीज़न में छुट्टी कैसे मैनेज करूं?

ऑफिस से घर आते ही आज फिर एक शादी का कार्ड मिला।

अभी शादियों का सीज़न पूरे जोरों पर है और लगता है हर वीकेंड किसी ना किसी की शादी में जाना पड़ रहा है।

दोनों बच्चों को संभालना, ऑफिस का काम पूरा करना, फिर वीकेंड पर शादी अटेंड करना, सच में थका देता है!

पहले वीकेंड में ट्रेक पर निकल जाती थी तो थोड़ा सुकून मिल जाता था। अब तो वो भी शादियों की भेंट चढ़ गया है।

छुट्टी मांगो तो ऑफिस में सवाल उठते हैं, और किसी शादी में ना जाओ तो रिश्तेदारों को बुरा लग जाता है।

बच्चों को भी साथ ले जाना पड़ता है क्योंकि घर पर छोड़ने वाला कोई नहीं है, और उनकी नींद-खाने का रूटीन भी बिगड़ जाता है।

समझ नहीं आ रहा कि किन शादियों में जाना ज़रूरी है और किन में politely मना कर दूं।

इतनी सारी शादियों को सब कैसे मैनेज करते हैं? कोई अच्छा तरीका है क्या मना करने का, बिना रिश्ता खराब किए?

कमेंट 5

  • गुलाबीधूप09.23

    शादियों का सीज़न सच में थका देने वाला होता है, ये मैं समझ सकती हूं। अभी हाल में जांच करवाई तो डॉक्टर ने आराम और नींद ठीक रखने को कहा था, तब समझ आया कि लगातार भागदौड़ करने से शरीर पर कितना असर पड़ता है। उसके बाद से सुबह थोड़ी देर टहलने लगी हूं और जो ज़रूरी नहीं लगता उसमें ना कहना सीख रही हूं। बच्चों की नींद और खाने का रूटीन बिगडे तो उसका असर बाद में दिखता है, इसलिए जितना हो सके उतना ही मैनेज करना

  • चाँदनी रात09.23

    वीकेंड का वो अपना ट्रेक वाला समय छिन जाना पढ़कर सच में समझ आया, अपनी चीज़ छूटने का दुख अलग ही होता है। मेरे यहाँ भी काम कभी इतना आ जाता है कि हफ्तों अपने लिए वक़्त ही नहीं बचता, फिर अचानक कुछ भी नहीं रहता।

  • गुनगुन09.23

    बच्चों को साथ ले जाकर उनकी नींद खाने की रूटीन बिगड़ने वाली बात सबसे ज्यादा छू गई। कितनी शादियां लाइन में हैं इस सीज़न में, सब करीबी रिश्तेदारों की हैं या दूर के भी शामिल हैं जी। दुकान अकेले संभालती हूं तो शादी के लिए बंद रखना भी मुश्किल हो जाता है, ग्राहक नाराज़ हो जाते हैं तो अलग तनाव हो जाता है। पिछले सीज़न में सिर्फ करीबी रिश्तेदारों की शादियों में गई, बाकी में शगुन भेजकर मन हल्का कर लिया,

  • → गुनगुनखुशबूलेखक09.24

    बच्चों की रूटीन बिगड़ने वाली बात सही कही आपने

  • गुनगुन09.24

    जितनी नजदीकी रिश्तेदारी है उतनी ही शादियों में जाना तय करती हूं, बाकी में शगुन भेजकर मन की बात कह देती हूं। दुकान अकेले संभालने की वजह से वीकेंड निकालना मुश्किल होता है इसलिए कुछ समय से यही तरीका अपना रखा है। जिनसे रोज का उठना-बैठना है सिर्फ उन्हीं शादियों में जाती हूं, बाकी सबको फोन करके बधाई दे देती हूं और किसी को बुरा नहीं लगता। शुरू में हिचकिचाहट होती थी पर अब आदत हो गई है जी।

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