आज लंच के बाद ठीक 2 बजे वाली मीटिंग में झपकी आ गई।
पूरे दस सेकंड के लिए बस ब्लैंक हो गई, फिर झटके से उठ गई। बॉस बोल ही रहे थे, पता नहीं सुना क्या-क्या।
रात में नींद पूरी नहीं हुई थी। बेटा 12 बजे तक जगा रहा, फिर सुबह 5:30 बजे उठकर टिफिन बनाना पड़ा।
वीकेंड का ट्रेक भी सिर पर है, और अगले हफ्ते कजिन की शादी अलग से। दोनों साथ मैनेज करना इन दिनों मुश्किल लग रहा है।
ऑफिस से निकलते वक्त लिफ्ट में एक कलीग ने पूछा – तबीयत ठीक है ना, चेहरा उतरा हुआ लग रहा है।
बस हां में सिर हिला दिया, कुछ कहने का मन नहीं हुआ।
घर पहुंचकर बच्चों को खाना दिया, खुद अभी तक कुछ नहीं खाया।
कभी-कभी लगता है दिन इतने भारी क्यों हो जाते हैं। कोई खास बात भी नहीं होती, फिर भी थकान पूरे शरीर पर हावी रहती है।
