रिटायरमेंट के बाद टाइम की कमी नहीं रहती, बस दिन का हिसाब गड़बड़ हो जाता है। सोना-उठना-खाना, कुछ भी फिक्स नहीं रहता।
पिछले हफ्ते सुबह की सैर शुरू की थी, साथ में हल्की स्ट्रेचिंग भी। 5 दिन ठीक चला, फिर एक दिन आलस आया और क्रम टूट गया।
कल दोपहर 3 बजे वाला शो देखने अकेले निकल गया। हॉल में मज़ा आता है, पर लौटते वक्त सड़क सुनसान लगी और अकेलापन थोड़ा चुभ गया।
पुराने ऑफिस के लोग बीच-बीच में कॉल करते हैं, मिलने या सलाह के लिए। मना करना अजीब लगता है, दूरी अभी ठीक से मैनेज नहीं हो पाती।
आज फिर से सुबह वाली सैर पर निकलने का मन बना लिया है!
