बच्चों को सुलाकर अभी थोड़ी देर के लिए बैठी हूं।
आज पूरा दिन अपने हिसाब से नहीं, किसी और के हिसाब से चला।
सुबह ऑफिस की मीटिंग थी, दोपहर में बेटी का होमवर्क, शाम को रिश्तेदार की शादी में जाना पड़ा।
शादी में मिलने वाले सब पूछ रहे थे,
“इतनी थकी क्यों लग रही हो”।
क्या जवाब दूं, कुछ समझ नहीं आया।
घर लौटकर बर्तन देखे, बच्चों का स्कूल बैग देखा, फिर चुपचाप सब समेट दिया।
पति तब तक सो चुके थे।
अपने लिए आज (कुछ भी) नहीं बचा।
10 बजे से अब तक यहीं बैठी हूं।
कुछ खास लिखने को नहीं है, बस मन थोड़ा हल्का करना था।
