शाम को बच्चों के साथ पार्क की तरफ निकली थी।
गली की लाइटें अचानक बदली हुई दिखीं।
सोसाइटी वाले पहले से डेकोरेशन लगा चुके हैं।
एक पल के लिए समझ ही नहीं आया कि त्योहार इतने पास आ गए हैं।
ऑफिस, घर का काम, बच्चों का स्कूल — इन सबमें ऐसी उलझी रही कि कैलेंडर देखना भी भूल गई थी।
छोटी बेटी ने पूछा, “मम्मी अभी से शॉपिंग नहीं करेंगे?”
मैं कुछ जवाब नहीं दे पाई, बस चुप रह गई।
पता नहीं क्यों मन थोड़ा भारी सा हो गया।
साल कैसे निकल गया, समझ ही नहीं आया।
काम में, स्किन की चीज़ें संभालने में, वीकेंड ट्रेक की प्लानिंग में — [खुद के लिए] रुकना ही भूल गई थी।
शादियों के कुछ कार्ड अभी भी घर में पड़े हैं, जिनका जवाब तक नहीं दिया।
लगता है अब सब कुछ एक साथ आने वाला है।
बस यही मन में आया, कोई खास बात नहीं थी।
